एक अधूरी प्रेम कहानी लेखक: विजय शर्मा एरी कसोल की वादियों में, नदी के किनारे बस्ती, पहाड़ों की गोद में, सपनों-सी सैर सपाटी। चीड़ की सरसराहट, घंटियों की मधुर तान, यहाँ शुरू हुई थी, एक प्रेम कहानी अनजान। पहली मुलाकात आरव था सादा, चाय की दुकान का मालिक, मुस्कान में जादू, आँखों में सपनों का आलम। गिटार की तान में, बस्ती थी उसकी दुनिया, हर धुन में बसी थी, एक अनकही जादुई शहना। मायरा आई थी, दिल्ली की चमक छोड़कर, कैमरे में कैद करती, जीवन का हर रंग उभर। नदी किनारे सूर्यास्त, जब तस्वीर में खो गई, आरव की धुन ने, उसे अपने पास बुला लिया। "इजाज़त तो ले लेती," उसने हँसकर टोका, "धुन थी प्यारी, या मैं?" मजाक में टटोला। मायरा मुस्कुराई, "शायद दोनों," बोली, उस पल से शुरू हुई, एक कहानी अनघट अनमोली। प्यार का रंग दिन बीते साथ-साथ, कसोल की गलियों में, मणिकर्ण के झरनों, तोष की पगडंडियों में। मायरा की तस्वीरों में, अब बस आरव बस्ता, उसकी मुस्कान, उसकी चमक, हर पल था रास्ता। एक रात, तारों तले, पहाड़ी की चोटी पर, मायरा बोली, "तुम सादे, फिर भी दिल की थाह पर।" आरव ने देखा आँखों में, "तुम मेरी दुनिया बनी, शहर की चमक में, मेरे गाँव की रानी बनी।" न कोई वादा, न कोई कसम, बस दिल का बंधन, उस रात, सितारों ने देखा, एक अनकहा संनादन। मायरा को लगा पहली बार, अधूरा न रहा उसका दिल, प्यार की लहरों में, डूब गया हर ग़म का सिलसिल। टीवी पर वो जोड़ा दो हफ्ते बीते, दिल्ली की पुकार आई, मायरा की दुनिया, अब उसे वापस बुलाई। आरव की जड़ें थीं, कसोल की मिट्टी में, दोनों की राहें, अब जुदा थीं रस्ते में। एक रात, गेस्टहाउस में, टीवी पर फिल्म चल रही, एक जोड़ा दिखा, प्रेम में डूबा, पर बिछड़न की गली। मायरा ठिठकी, मन में कौंधा एक सवाल गहरा, "क्या मेरी कहानी भी ऐसी? या इससे भी जटिल बवंडर?" "क्या बचा सकते हैं प्यार?" उसने आरव से पूछा, "यह सिर्फ़ याद न बने," दिल ने आह भरी छूछा। आरव चुप रहा, फिर बोला, "प्यार को न बाँध, मायरा, सच्चा हो तो, राह खुद बनाएगा, न कर तकरार।" आँसुओं में डूबी, मायरा ने दी एक तस्वीर
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