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🌿बरगद और वो🌿 ✍️ कवि: विजय शर्मा एरी --- (1) बरगद के नीचे बैठा वो, हर शाम उदासी ओढ़े, पत्तों की सरसर में ढूँढे, बीते कल की जोड़े। हवा में उसकी यादों की, अब भी हल्की गंध है, बरगद भी अब बूढ़ा सा, पर दिल में वही छंद है। --- (2) कभी हँसी थी इस छाँव में, कंचे और खिलौने, अब बस सूखी पत्तियाँ हैं, और तन्हाई के सोने। वो बोला था—"लौट आऊँगा", आंखों में थी आस, बरगद ने तब कसमें खाईं, रखेगा उसका विश्वास। --- (3) बरसों बाद वो लौटा जब, वक्त बदल चुका था, बरगद तो वहीं खड़ा था, पर वो जल चुका था। जड़ें भीगी थीं आंसू से, पत्ते थे उदास, धरती ने पूछा—"कहाँ गई तेरी वो साँस?" --- (4) कभी उस पेड़ के नीचे, दो परछाइयाँ मिलती थीं, एक उसकी, एक उसकी, जो शाम ढले खिलती थीं। अब बस छाँव रह गई, परछाइयाँ खो गईं, बरगद ने सहेज रखीं, वो धड़कनें जो सो गईं। --- (5) हवा जब धीरे चलती है, पत्ते फुसफुसाते हैं, उनके अधूरे वादे, फिर से दोहराते हैं। बरगद के हर पत्ते में, उसकी याद बसती है, वो लड़की अब नहीं रही, पर आत्मा हँसती है। --- (6) रातें जब बहुत शांत हों, तारे जब गुमसुम हों, बरगद की शाखों में, उनके गीत महकते हों। "तेरे बिना ज़िंदगी से..." गूंजे कोई धुन पुरानी, बरगद भी रो देता है, ओस में भीगी कहानी। --- (7) अब गांव के बच्चे पूछें—"ये पेड़ इतना बड़ा क्यों?" वो मुस्कराकर कह देता—"किसी ने इसे प्यार दिया यूँ।" हर शाख़ में इक किस्सा है, हर पत्ते में इक दर्द, बरगद ने सहेज रखे हैं, दो दिलों के जर्द। --- (8) वो अब नहीं, पर उसकी खुशबू मिट्टी में बाकी है, बरगद के हर साँस में, उसकी झिलमिल झांकी है। जब भी कोई प्रेमी वादा करे, इस छाँव में बैठ, बरगद हौले से कहता— "प्यार कभी मरता नहीं, बस रूप बदल लेता है..." 🌿 --- – विजय शर्मा एरी

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