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--- पहाड़ी गुफा का रहस्य ✍️ विजय शर्मा एरी --- देवदारों के ऊँचे वन में, छुपा था छोटा-सा गाँव, सुनहरी धूप बिखरती थी, पर आँखों में था डराव। गाँव के बीच खड़ी गुफ़ा थी, नाम था उसका कालेश्वर, दिन में भी वहाँ अँधेरा, रात में जैसे तांडव स्वर। बुज़ुर्गों की जुबान पर अक्सर, भूत-प्रेत की बातें थीं, लाल रोशनी, चीखों का डर, यादें बनकर आती थीं। कहते थे—“ना जाना बेटा, वहाँ से कोई लौट न पाया। गुफ़ा में है पिशाच पुराना, जिसने सबको है भरमाया।” --- दिल्ली से तीन मित्र चले थे, अर्जुन, कबीर और सिया। दिलों में थी हिम्मत भारी, साथ था सपनों का दिया। गाँव में पहुँचे देख नज़ारे, बर्फ़ की चादर, ठंडी हवा। सिया बोली—“ये तो जन्नत है, खिंचूँगी हर तस्वीर नवा।” अर्जुन बोला—“मगर यहाँ पर, रहस्य कोई छुपा हुआ है। गाँव का डर बताता मुझको, कुछ अनसुलझा लिखा हुआ है।” कबीर हँसकर कहने लगा— “तुम्हें रहस्य ही चाहिए। मुझे तो बस चाहिए आराम, और गरमागरम चाय चाहिए।” --- चौपाल में जब बैठे सबने, सुनी बुज़ुर्गों की बातें वहाँ। एक बूढ़ी औरत ने कहा— “गई थी फिर रोशनी गुफ़ा।” गोविंद काका बोले धीमे— “ना जाना बच्चो उस ओर। लौट न पाए कई यहाँ से, लगा वहाँ जैसे मौत का शोर।” तीनों ने सिर तो हिलाया, पर मन में ठाना दृढ़ विचार। “खोलेंगे हम पहाड़ का राज़, ढूँढेंगे सच, करेंगे उजियार।” --- सुबह हुई, निकले पथिक वो, रस्सी, टॉर्च लिए संग-संग। बर्फ़ीले पथ पर बढ़ते ही, सन्नाटा छाया था हर अंग। पेड़ों के बीच मिली झोपड़ी, टूटी-फूटी हालत उसकी। भीतर पड़ी थी फटी डायरी, जैसे रहस्य कहे झलकी। लिखा था उसमें किसी वैज्ञानिक ने, “ऊर्जा स्तंभ यहाँ छुपा है। चुंबक शक्ति की लहरें हैं, यही रहस्य हमें रुका है।” पन्ना फटा था बीच में लेकिन, कहानी अधूरी छोड़ गया। सिया बोली—“तो सच ये होगा, विज्ञान ने डर को मोड़ दिय

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